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मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

भंवर


वो चुपचाप बस स्टाप पर खडी बस का इन्तजार कर रही थी, पिछले दो सालों से तो वो बस से आना जाना भूल ही गयी थी। वो हमेशा रितेश के साथ ही बस से आया जाया करती थी। जिस किसी दिन अगर रितेश को छुट्टी लेनी होती उस दिन या वो भी छुट्टी ले लेती या फिर ऑटो से आती जाती। कभी कभी रितेश कह भी देता - यार इतने सारे लोग तो बस मे आते जाते है, तुम कभी अकेले क्यो नही जा पाती बस से, तो वो हल्के से बस मुस्करा कर कह देती - क्या करूँ , मुझे बस की भीड में ऐसा लगने लगता है जैसे मै किसी भँवर में फंस जाउंगी । और फिर तुमहारे रहते मै भला अकेले क्यो जाऊं। अचानक उसे वो दिन याद आ गया जब रितेश ने उसके जन्म् दिन से दो दिन पहले उससे झगडा करके बोलचाल बन्द कर दी थी। कहाँ उसका मन था उस दिन ऑफिस आने का, अगर जरूरी मीटिंग ना रही होती तो वो उस दिन ऑफिस ना आई होती। सभी ने तो उसको बधाई दी थी , एक उसे छोड कर, और मेरी खुशी तो सिर्फ उसमे ही बसती थी। आंसू थे कि बस पलकों पर रोके थे, ऑफिस में सबके सामने कमजोर नही पडना चाहती थी। कितनी बार कोशिश की थी कि आधे दिन की छुट्टी ले कर घर चली जाऊं। मगर रितेश जो मेरा चेहरा देख कर मेरे मन की हर बात पढ लेता था, आज मेरी आँखों सेछलकने को तैयार आंसूं नही दिख रहे थे। ऑफिस से निकल कर बस स्टाप मे खडी बस से ज्यादा रितेश का इन्तजार कर रही थी। मन मे एक उम्मीद थी कि बस वो आ कर मुझे जन्मदिन की बधाई दे । उसका बात कर लेना ही मेरे लिये किसी तोहफे से कम ना होता। इसी उधेड्बुन में खडी खडी तीन बसे छोड चुकी थी। अंधेरा भी हो रहा था कि तभी एक बाइक मेरे बिल्कुल करीब से आ कर रुकी। घबराहट, अपने अकेले होने और आज रितेश के मेरे साथ ना होने की मिश्रित सी भावनाओं ने मेरे रुके हुये आंसुओं को और रुकने ना दिया। और मै मुंह हाथों से ढकते हुये रो पडी थी। तभी किसी ने मेरे चेहरे से हाथ हटाते हुये, दूसरे हाथ से मेरी तरफ ताजे लाल फूलों का गुलदस्ता मेरी तरफ करते हुये कहा- इति, तुम्हे जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो, और ये रहा तुम्हारा तोहफा ड्राइवर के साथ। और होले से झुकते हुये सलाम करने के अंदाज में कहा, आइये मैडम कहाँ छोडना है आपको। फिर कितनी देर तक वो रितेश के साथ हवा से बाते करते हुयी उडती रही थी।

काश आज फिर किसी भी बहाने से रितेश आ जाता। मगर वो जानती थी कि आज वो जहाँ जा चुका है वहाँ से कभी कोई भी लौट कर नही आया। उसका साथी, उसका ड्राइवर एक एक्सीडेंट मे अपनी जान गवां चुका है, इस सत्य के साथ उसे बाकी का जीवन बस की भीड भरे भंवर में अकेले ही बिताना है।
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9-4-15 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1943 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. ऐसे किस्से जिंदगी की याद बन जाते हैं और ऐसे हादसे जीवन का गम ! बढ़िया कहानी लिखी है आपने डॉक्टर अपर्णा जी

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