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बुधवार, 29 अप्रैल 2015

त्रासदी फिर आ सकती है


वो चुपचाप सहती रही 
देती रही जीवन
करती रही पालन
अपने कर्तव्यों का
माफ करती रही
भूल जो अंजानी नही थी
फिर एक दिन 
छलक पडा बाँध
सब्र का
बहुत सोचा कैसे दूँ तकलीफ
अपनो की ही
मगर कोई और रास्ता ना था
भटके को राह दिखाने का
एक हल्की सी भृकुटि तनी
और समाप्त हो गये 
अनगिनत जीवन
रो पडी थी धरा भी, देख अपनी ही करनी
कि नही चाहा था उसने विनाश
पर क्या करती
आखिर सहन की 
कहीं तो सीमा थी
पर आह! धन्य है मानव
इस विपदा मे भी
नही तजा उसने 
विभाजन का धर्म
ढूंढ निकाले उसने
राजनीति के सूत्र
बना ही ली धर्म की दीवारे
करने लगा धार्मिक शिनाख्त 
छिन्न भिन्न विभक्त शरीरों की
विभाजित कर दिया लाशों के ढेर से
हिन्द , पाक और नेपाल

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर ! सार्थक संवेदनशील रचना !

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (01.05.2015) को (चर्चा अंक-1962)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पर क्या करती
    आखिर सहन की
    कहीं तो सीमा थी
    पर आह! धन्य है मानव
    इस विपदा मे भी
    नही तजा उसने
    विभाजन का धर्म
    ढूंढ निकाले उसने
    राजनीति के सूत्र
    संवेदनाओ को समझना अलग बात है लेकिन पाकिस्तान ने नेपाल के लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ ही किया है ! गरीबी हर जगह और हर स्तर पर बुरी होती है ! अगर नेपाल गरीब राष्ट्र न होता तो शायद कोई इस तरह की हिमाकत न करता ! संवेदनशील घटना पर सार्थक शब्द

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