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गुरुवार, 11 मई 2017

क्या कहिये




जो दिख रहा वो सच नही 
फिर अनदिखे को क्या कहिये 
हस रहे जख्म महफिलो में
गुमसुम खुशी को क्या कहिये

हर किसी ने हर किसी की
किस्मतों पर रश्क खाया
फिर भी आसूं हर आँख में 
तो नजरिये को क्या कहिये

दिल लगाया इसलिए कि
दिल को तो कुछ सुकून हो
दिल लगा सूकूं काफुर हुआ 
तो दिल्लगी को क्या कहिये

कुछ कर गुजरने की चाहत 
जगी तो वो नेता बन गए 
कुछ छोड, कर गुजरे वो सब
तो दिल्ली को क्या कहिये 

जीते जी वो मर गए जो
हो गये जिंदगी से खफा 
जिन्दगी फिर भी न रूठी 
तो जिंदगी को क्या कहिये

2 टिप्‍पणियां:

  1. जिंदगी एक सी कभी नहीं रहती ..
    बहुत सुन्दर ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-05-2017) को
    "लजाती भोर" (चर्चा अंक-2631)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    उत्तर देंहटाएं

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