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शनिवार, 13 मई 2017

अतिथि देवो भवः


पिछले तीन महीने से दो चीजों की मार झेल रहा था-  बीमारी, और पैसा, एक और भी चीज है गर्मी मगर शायद उसको गिनाना उचित नही लग रहा, वरना आप लोग समझेगें की नाहक ही अपनी परेशानियां बढा चढा कर लिख रहा हूँ । मौसम की सबसे ज्यादा मार गरीब पर ही पडती है और इसे एक गरीब ही बेहतर समझ सकता है।
एक तरफ जहाँ दुनिया में सभी को छुट्टियों और खास कर इतवार का इन्तजार रहता मुझे लगता कि शनिवार के बाद यदि किसी भी तरह सम्भव हो सकता तो मै सोमवार ले आता। अरे नही नही ये ना समझिये कि मै अपनी पत्नी से तंग हूँ, सच तो यह था कि मैं घर आने वाले मेहमानों से डरता था, सभी समझते थे कि मै बहुत ठीक से रह रहा हूँ किसी को मुझसे मदद चाहिये होती थी किसी को मदद का वादा। और इधर तो जबसे मुन्ने की तबीयत क्या खराब हुयी सभी अपने को एक से ज्यादा हमदर्द बताने के लिये आते थे, मगर उनके आने से दर्द कम होता था या ज्यादा ये सिर्फ हम दो प्राणी ही जानते थे। अपनी छोटी सी कमाई से जैसे तैसे काम चला ही लेता था मगर इधर तीन महीनों से मेरी कम्पनी की हालत कुछ ठीक नही थी और क्म्पनी की इस हालात ने मेरी कमर तोड दी, ऊपर से  बच्चे की बीमारी और गर्मी। कितना सोचा था कि इस बार नया नही तो पुराने कूलर का जुगाड जरूर कर लूंगा मगर अरमान बस रात के सपने की तरह ही रहे। 
एक दिन श्रीमती जी ने कहा- सुनो मुन्ने को देखने अक्सर कोई ना कोई आया ही करता है और फिर इतनी गर्मी है तो खाली पानी देना जरा ठीक सा नही लगता, अब रोज रोज नीबू या कुछ मीठा तो लाया जा नही सकता अगर हो सके तो रूहाफ्जा की एक बोतल ला दो। 
मुझे श्रीमती जी की बात ठीक भी लगी। गाँव पास ही होने के कारण अक्सर कोई ना कोई आया ही करता था, और फिर सबके सामने गरीबी का रोना तो नही रोया जा सकता। मैने कहा ठीक है एक दो दिन में देखता हूँ ।
आज इतवार था, मगर आज उतना परेशान नही था, कारण था रूहाफ्जा की बोतल घर आ चुकी थी। अभी जैसे तैसे हम लोग खाना खा कर लेटे ही थे कि मुन्ने की दूर की बुआ यानी मेरी बहन ने दरवाजे पर लगी डोरबेल बजाने की जगह अपनी आवाज से ही काम लेना ज्यादा उचित समझा, और हमे दरवाजा खोलने से पहले ही अपने अतिथि की सूचना मिल गयी।
यहाँ मैं अपनी पत्नी के एक कौशल की तारीफ जरूर करूंगा, चाहे जितना दुखी हो या चाहे जितना सामने वाले को पसन्द ना करती हो मगर मिलती ऐसी आत्मीयता से थी बस सामने वाले के मन में यदि कही जरा सा भी जहर हो तो अमॄत बन जाय।
कोकिला दीदी हमारे गाँव के सरपंच जी की बेटी है, ना रूप गुण की राशि ना पढाई लिखाई पर सौभाग्य ऐसा की लखपति को ब्याह गयीं। हमारी श्रीमती जी किसी के धन बल पर रीझ जाय या सम्बन्ध व्यव्हार बढाये ऐसी महिला ना थी। और कोकिला दीदी के पास गर्व करने के पर्याप्त संसाधन ईश्वर ने जुटा दिये थे। सो आप उन दोनो के सम्बन्ध की मधुरता की कल्पना कर ही सकते हैं।
दो चार मिनट की वार्तालाप के बाद श्रीमती जी उठी और बोली- दीदी आपके लिये कुछ ठंडा लाती हूँ। और थोडी ही देर में वो दो ग्लास रूहाफ्जा ले कर आयी।
कोकिला दीदी मुँहफट है ये तो मै बचपन से जानता था मगर आज भी नही बदली इसका आभास नही था। ग्लास देखते ही बोली- क्या रे निखिल, तुमने अपनी बीबी को नही बताया कि तेरी दीदी को रुहाफ्जा बिल्कुल भी पसन्द नही। फिर थोडा नाटकीय अंदाज से बीते समय को याद करते हुये बोली - मुझे याद है तेरी शादी में भी टंकी का टंकी यही घोल दिया गया था, मगर चाचा तक को याद था कि उनकी बिटिया तो इसको हाथ तक नही लगा सकता तब कही से उन्होने मेरे लिये कोकाकोला की बोतल मंगायी थी।
मै उनकी बात का मतलब समझ रहा था, तुरन्त उठा और बोला- अरे दीदी, इसको बताया तो था मगर शायद बच्चे की बीमारी में याद ना रहा होगा, आप बताओ ना क्या पियोगी, वही कोकाकोला या कुछ और..। कुछ और नही तुम तो कोकाकोला ही ला दो।
बस मै अभी आया कह कर मेरा हाथ जेब में पडा जिसमें आखिरी पचास का नोट और मुन्ने की दवा का पर्चा थे। मन ही मन सोच रहा था कि यदि रूहाफ्जा पी ही लेती तो क्या बिगड जाता आखिर लोग कडवी दवाई कैसे पी जाते है फिर रूहाफ्जा इतना भी बुरा तो नही, टी वी पर भी तो एड आते हैं तभी मेरी निगाह अपनी पत्नी पर गयी जिसकी आंखों में मै साफ पढ सकता था – अतिथि देवो भवः

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