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मंगलवार, 13 जनवरी 2015

एक जिन्दगी - बिन मुखौटा..... An Unmasked Life


वो चाह रही थी जीना
वो जिन्दगी
जिसमें ना पहनना पडे
कोई मुखौटा
तलाश रही थी
चंद खुशी के पल
जो दे सकें सुकून
ठंडी रेत सा
तडप छुपी थी
उसके अंतस में कही
जैसे वो हो मछली
बिन पानी की
भरे थे हाथ
खुशियों से
फिर भी दूर दूर तक
खुशी लापता थी
अपने थे उसके
दायें बाये और सामने
मगर फिर भी थी
तन्हा अकेली सहमी
निगाहों में थी तलाश
उस आग की
जो जला दे
उथल पुथल उसके मन की
दो पल दो घडी ही सही
वो जीना चाहती थी
एक स्वच्छंद हंसी
आकाश सी
एक सच्ची खुशी
बचपन सी
एक निस्वार्थ साथ 
कान्हा सा
एक अन्नत पल 
ईश्वर सा

एक जिन्दगी
बिन मुखौटे की 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15-01-2015 को चर्चा मंच पर दोगलापन सबसे बुरा है ( चर्चा - 1859 ) में दिया गया है ।
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर ।
    मकर संक्रान्ति की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  3. दो पल दो घडी ही सही
    वो जीना चाहती थी
    एक स्वच्छंद हंसी
    आकाश सी
    एक सच्ची खुशी
    बचपन सी
    एक निस्वार्थ साथ
    कान्हा सा
    एक अन्नत पल
    ईश्वर सा
    बहुत सुन्दर ।

    उत्तर देंहटाएं

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