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रविवार, 11 जनवरी 2015

कहने लगा

अब तो मुस्कराना भी गुनाह सा होने लगा,
कातिल मेरी हसीं को जमाना कहने लगा ।

जो खुली जुल्फ लिये आये महफिल में हम
कोई सावन की घटा कोई जंजीर कहने लगा ।

हौले से ही तो खनकी थी नांदा पायल मेरी,
जिसे देखिये इसे हुस्न की अदा कहने लगा ।

हवा के झोकें ने लहराया जो पीला आंचल,
भंवरा हो जाने को बेताब हर कोई होने लगा ।

ना पूंछा किसी ने हाले दिल पलाश से कभी,
रंग उसके चुरा सिर्फ मन अपना भरने लगा ।

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर ग़ज़ल! साभार! आदरणीया अर्पणा जी!
    धरती की गोद

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  2. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (13-01-2015) को अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये..; चर्चा मंच 1857 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    उल्लास और उमंग के पर्व
    लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. कुछ कह दिया—
    खूबसूरत सा—
    मेरी पायल भी
    गजल होने लगी

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  4. जो खुली जुल्फ लिये आये महफिल में हम
    कोई सावन की घटा कोई जंजीर कहने लगा ।

    हौले से ही तो खनकी थी नांदा पायल मेरी,
    जिसे देखिये इसे हुस्न की अदा कहने लगा ।
    बहुत सुन्दर ..

    उत्तर देंहटाएं

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