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शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

अनकही



एक बात कहूँ
जिसे आज तक नही कहा
दिल में एक ख्वाइश जगी है 
तुझे पढना चाहता हूँ

सुने हैं कई कई बार
तेरे खनकते अल्फाज
पढना चाहता हूँ
वो सब जो छुपा है 
तेरी झुकी नजर में
वो लफ्ज जो रुके है 
तेरे सुर्ख लबों पें
जिससे नही हटेगा
कभी शर्म का पर्दा

पढना चाहता हूँ
तेरी चूडियों की खनक
जिसे खनका के तुम 
जाने क्या क्या कह जाती हूँ
और उस धुन में ढूँढता हूँ
तुम्हारे प्रीत के मोती

पढना चाहता हूँ
तेरे पलकों के उठने और झुकने को
जिसे तुम बना लेती हो
माध्यम इनकार और इकरार का
जिसे समझता हूँ मै
सिर्फ एक अदा

पढना चाहता हूँ
तेरी ना और हाँ को 
कितनी बार तेरी ना
हो जाती है हाँ
तेरे कहने की अदा को 
मै देख नही पाता
समझ बैठता हूँ
तेरी ना को ना ही

पढना चाहता हूँ
तेरी उलझी सुलझी लटों को
जिसमें उलझा लेती हो
अपनी अनकही
कभी कांधे पर रखती 
कभी झटक देती हो 
अपने अधखुले केश
समझनी है 
तेरे केशुओं की भाषा



पढना चाहता हूँ
तेरी खामोशियों को
बस कुछ पल 
बैठी रहना यूं ही
कुछ भी ना कहना
झुका लेना कभी नैन
कभी लुल्फों को उलझाना
कभी हौले से मुस्कुरा देना
कभी कंगना खनका देना

4 टिप्‍पणियां:

  1. पढ़ने दीजिये... इंसानी रिश्तों को पढ़ने समझने की जरूरत तो हमेशा से ही रहेगी.... :)

    बाइ द वे, आपके ब्लॉग पर लगे एड को क्लिक करके जा रहा हूँ... लॉगिन करके बताइएगा कितना फाइदा हुआ... :P हमने भी एड लगाए हैं लेकिन अब तक कुछ नहीं हो रहा... :)

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  2. धन्यवाद अपर्णा जी आप की rachanaye दिल को...............

    उत्तर देंहटाएं
  3. ​बहुत खूब ! पढ़ने दीजिये इंसानी रिश्तों को इंसानी रिश्ते ऐसे ही होते हैं की उन्हें पढ़ने और समझने की जरूरत तो हमेशा से ही रही है और रहेगी​ भी

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी लगी ये रचना...खास तौर पर ये पंक्तियाँ..
    पढना चाहता हूँ
    तेरी खामोशियों को
    बस कुछ पल
    बैठी रहना यूं ही
    कुछ भी ना कहना

    उत्तर देंहटाएं

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