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शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

मेरे सच्चे मित्र

ना तुमसे थे
सम्बंध रुधिर के
ना तुमसे रिश्ते
जाति धर्म के
फिर भी तुझमे
मेने पाये
अंश अपनी
आत्मा के
कितनी भी दूर
गये हम तुमसे
सदा ह्रदय के
पास ही पाया
जीवन की
काली रातों में 
इक तूने ही मेरा
साथ निभाया
 मुझे याद है
वो दिन अब भी
जब मैने नौकरी
पायी थी
और भूल के अपनी
असफलता तुमने
मेरे संग दिल से
ढेरो खुशी मनायी थी 
वो सच्चा स्नेह तुम्हारा
याद जब जब आता है
आँखे नम हो जाती हैं
सीना चौडा हो जाता है 
मुझे गर्व कि
मुझको तुमसा
मित्र मिला 
इस जीवन में
मुश्किलों का डर ना
मेरे मन में
जब साथ तेरा 
इस जीवन में 


बुधवार, 21 जुलाई 2010

पागल कौन ?


आज सुबह बस का इन्तजार कर रही थी कि तभी मेरी नजर एक आदमी पर पडी। वो सडक पर पडे कूडे को बीन रहा था। एक छोटा से छोटा कागज का टुकडा उसकी नजर में था। जहाँ तक वो देख सकता था , वो सडक साफ करना चाह रहा था। सडक के किनारे बनी पान की दुकान पर खडे कुछ लोगो के लिये वह मनोरंजन का सामान था। बीच बीच में लोग उसको चिडाने के लिए कभी पान मसाला का खाली पैकेट सडक पर फेंक देते तो कभी केले का छिलका , मगर वो तो अपने काम में इतना तल्लीन था कि बस अपना काम किये ही जा रहा था। तभी एक लडके ने पान थूका और बोला ऐ पागल अब इसे उठा कर दिखा । यह सुनते ही वह हम सबके देखते ही देखते विघुत गति से उसकी तरफ लपका और एक थप्पड उसके गाल पर रख दिया । बस उसके मारने की देर थी कि वहाँ खडे सभी भद्र जनो को अपनी शारीरिक क्षमता दिखाने का मौका मिल गया।
और मै मूक दर्शक बनी सोचती रही कि आखिर पागल कौन ?

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

भूख बडी या नींद










इंसा सोए बिना रह सकता या
भूखे पेट वो सो सकता है
हम आज तलक ना जान सके कि
भूख बडी या नींद
रोटी और नींद दोनो में
किसकी कीमत है ज्यादा
या रात दिवस के जैसे
जीवन नही हो सकता पूरा
गरीब बिना रोटी है मरता
धन वाले तरसते सोने को
कोई कर्ज ले खाने को
कोई दान चढाये सोने को
कभी सूखी रोटी से भी
त्रप्त आत्मा हो जाये
कभी कीमती मेवे भी
एक पेट ना भर पाये
इक टूटी सी खाट कभी
स्वप्न लोक की सैर कराये
कभी रेशमी मखमल भी
दो पल का ना चैन दे पाये
मिल जुल कर चाहे गर हम तो
सभी खाये और सोये जग में
भूखो को दे खाने को और
ले उनसे दुआयें चैन से सोयें

बुधवार, 14 जुलाई 2010

बदलती हवायें

 

युग बदले मौसम बदले
बदले इंसानों के चेहरे
धर्म और कर्म रहे मगर
आस्थाएं और वजहें बदल गयी
 हवाओं की ठंडक बदल गयी
लू की तपिश भी बदल गयी
सलोने से बसन्त की 
तरुणाई भी है बदल गयी
रिश्ते और नाते है अब भी
निभाने के तरीके बदल गये
शब्दकोष तो रहा वही
बस उच्चारण बदल गये 
शिष्टाचार रहा प्रतिदिन का
पर परिभाषायें बदल गयी
त्याग और्र विश्वास की
सारी सीमायें बदल गयी
परिवर्तन करते करते
हम इतने परिवर्तनशील हुये
कि मौसम के बदलने के 
रास्ते भी सारे बदल गये 

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

कृषक हमारी राह निहारे

आज हमारे कृषि प्रधान देश में किसानों को ही दो जून की रोटी के लाले पडे है ।वो जो सारे देश के लिय अन्न जुटाता है , क्या हमारा उसके लिये कोई फर्ज नही । मुझे आप सभी के सहयोग की जरूरत है क्योकि










माना कि अकेले पथ पथ पर चलना
थोडा मुश्किल होता है
साथ अगर मिल जाये तो
सफर आसां कुछ होता है
चिंगारी मै बन जाती हूँ
आप बस इसमें घी डालो
सारे समाज की बुराई को
इसमें आज जला डालो
गर किसान ही नही रहा तो
पेट की आग तब भडकेगी
तेरे मेरे घर की सारी
बुनियादें तब बिखरेंगी
कहाँ पे लहरायेगा तब
झंडा अपनी प्रगति का
रुक जायेगा थम जयेगा
पहिया जीवन की गति का
खोखली हो गयी नींव जो अपनी
तो कैसे बचेगी प्रतिष्ठा की इमारत
क्या आने वाली पीढी लिखेगी
अपनी ही बर्बादी की इबारत
हाथों में ले कलम की शक्ती
अपना कल हम आज संवारे
मुड कर देखे गांव फिर अपना
कृषक हमारी राह निहारें 

सोमवार, 12 जुलाई 2010

sad version of एक दिन आप यूँ हमको मिल जायेंगे

एक दिन आप यूँ दूर हो जायेंगें
भूल जाने को मजबूर हो जायेंगें
मैने सोचा न था ssss
इस कदर जिन्दगी मेरी होगी दुखी
रोयेगा आसमां रोयेगी ये जमीं
मैने सोचा न था ssss

दिल की राहों में कांटे से चुभने लगे
आप जब दूर हमसे थे होने लगे
एक दिन इस तरह हम बिछड जायेंगें
इक झलक को नयन ये तरस जायेंगें
मैने सोचा न था ssss

धुंधली धुंधली मेरी हर इक रात है
रात है या अमावस की सौगात है
एक दिन दिल की राहों मे मेरे लिये
ना जलेंगें मोहब्बत के दो भी दिये
मैने सोचा न था ssss

एक दिन आप यूँ दूर हो जायेंगें

भूल जाने को मजबूर हो जायेंगें

मैने सोचा न था ssss

dedicated for those who lost their love anyways

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

ये भी होता है

आज अनजाने में मुझसे
इक खता ऐसी हुई
चोट पहुँची अपने किसी को
आँख नम मेरी हुयी
वक्त और हालात नें
इतना बेबस मुझको किया
अपनी ऐसी जिन्दगी पे
मुझको शर्मिंदगी हुयी
 हाथ जो कल तक उठे थे
माँगने को उनकी दुआ
आज उनके कत्ल को
मजबूर ये जिन्दगी हुयी
था बसाया जो चमन
दिल से बडे अरमान से
वो ही मेरी हर खुशी की
कब्रगाह है बन गयी

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

वापस बचपन पाया






एक दिवस मैं सोच रही थी
यूँ ही बैठे बैठे
जाने कहाँ छोड आयी
प्यारे बचपन को मैं
कितने प्यारे दिन थे जब
मै मिट्टी खाती थी
और थोडी हाथों में भर कर
माँ के लिये लाती थी
कभी प्यार से ले लेती थीं वो
कभी डपट देतीं थीं
अब फिर से मत खाना कह्के
मुहँ मेरा धो देती थीं
खोई हुयी थी बीते कल की
स्वर्णिम मधुर स्म्रति में
तभी लाडली दौडी आयी
कुछ मुट्टी में बन्द किये
आकर बोली माँ देखो
क्या तेरे लिये मै लायी
थोली ही मै खा कल आयी
बाकी तुमको ले आयी
जे लो मैया तुम भी काओ
कह जब उसने हाथ बढाया
खोये हुये बचपन को वापस
मैने बिटिया में पाया



 सुभद्रा कुमारी चौहान जी की कविता से प्ररित
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